बॅटवारा

Long poems

ना जाने इसकी ग़लती थी या उसकी ग़लती थी

बस रेल-गाड़ियाँ लाशों से भरी चलती थी

मौत मज़हब की बात करती थी

सहमी हुई दुआएँ अजूबों  को याद करती थी

जिन्दगी  अब एक लकीर  की  मोहताज़  थी

कल  रात जो चीख  सुनी वो कोई जानी – पहचानी ही आवाज थी

पीछे छूट गए घरों में अब खौफ रहता  था

घर भी उसके , गांव भी उसके , शहर भी उसके

भागते इन्सानों  को देख बस हसता रहता था

प्यार मुहब्बत पटरियों  पे पड़े  मिलते थे लहूलुहान

सरहद पे दौड़ती  रेलगाड़ियाँ थी शायद इस बात से अंजान

कहने को तो हजारों  लोग जो उन  रेलगाड़ियों  में  सवार  हुए

पर बड़ी  कोशिशों  के बाद भी, बस मातम ही थे जो  सरहद के  आर पार हुए ।