वक्त की मांग

Long poems

वक्त की मांग है कि ,

तुम तीन साल में ही तीस की हो जाओ

ये बचपन किस काम का है तुम्हारे

ये बस तुम्हें अबोध  रखेगा |

तुम कैसे समझ  पाओगी जब कोई हाथ,

अनायास ही तुम्हें टटोल जाएगा |

या फिर कोई पुचकार के तुम्हें,

मिठाई के बहाने कहीं  और ले जाएगा |

तुम तो अभी दादा – दादी को भी, 

नहीं पहचान पाती कभी कभी  |

तुम कैसे इन हजारों  चेहरों में

सच और झूठ पहचान पाओगी |

तुम कैसे पढ़ पाओगी,

की किसी की आँखों में आज वहशीपन है,

या कोई हत्या के इरादे से आया है आज |

तुम्हारी वर्णमाला की किताब तो अभी कल ही आयी है

और हत्या तो काफी कठिन शब्द है |

तभी मैं  कह रहा हूँ ,

उतार फेंको ये बचपना , और नाखून बड़े करो

नोचना सीखो , लात मरना सीखो |

ये गुड़िया और बाकी के मुलायम खिलौने जला दो

समय ने इनको नकारा बना दिया है |