याद है

Long poems

याद है वो शहर जहाँ  ख्वाबों  के तकिए होते थे

वजहों  की बत्ती  गुल करके हम नींद  की फलियाँ  बोते थे

याद है जब नर्म  धूप  से दर्द पिघल से जाते थे

नीले नीले से अम्बर में हम मीलों उड़ के आते थे

याद है वो रात की चादर जिनसे तारे टूटा करते थे

और हम चुपके से आँखे  मूंदे एक लम्बी सी ख्वाहिश करते थे

याद है वो खेत  जहाँ फसलें  खुशियों  की पकती  थीं  

मुट्ठी भर ही मिले सही पर कुछ कुछ सबमे बटती  थीं  

तभी किसी  ने टोका मुझे और बोला ये कौन सा शहर है भाई

सपना – वपना देख रहे हो क्या , लगता है बड़े दिन बाद आये हो

शहर तो वो देखो भागे  जा रहा है  

कई साल हो गए जागे जा रहा है

शहर के पास अब काम धंधा है

तुम जब मिले थे तब शायद काम पर नहीं जाता था

अभी भी आवाज दोगे  तो एक नज़र देखेगा तुम्हे

पर रुकेगा नहीं , अब वो किसी के लिए नहीं रुकता

न रुकता  है न थकता  है ,

और हाँ ,

ख्वाब और ख्वाहिश अब यहाँ  नहीं रहते  

दोनो एक दिन जाते दिखे फिर लौट के नहीं आये

उनके घरों  में अब बहरूपिये  रहते  हैं  

तुम भी मिल आओ ।

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