रंग

short poems

रंगों  का बड़ा शौक है उसे ,

जिस दिन से आयी वो घर में,

परदे गुलाबी हो गए और जिंदगी सुनहरी ।

Advertisements

याद है

Long poems

याद है वो शहर जहाँ  ख्वाबों  के तकिए होते थे

वजहों  की बत्ती  गुल करके हम नींद  की फलियाँ  बोते थे

याद है जब नर्म  धूप  से दर्द पिघल से जाते थे

नीले नीले से अम्बर में हम मीलों उड़ के आते थे

याद है वो रात की चादर जिनसे तारे टूटा करते थे

और हम चुपके से आँखे  मूंदे एक लम्बी सी ख्वाहिश करते थे

याद है वो खेत  जहाँ फसलें  खुशियों  की पकती  थीं  

मुट्ठी भर ही मिले सही पर कुछ कुछ सबमे बटती  थीं  

तभी किसी  ने टोका मुझे और बोला ये कौन सा शहर है भाई

सपना – वपना देख रहे हो क्या , लगता है बड़े दिन बाद आये हो

शहर तो वो देखो भागे  जा रहा है  

कई साल हो गए जागे जा रहा है

शहर के पास अब काम धंधा है

तुम जब मिले थे तब शायद काम पर नहीं जाता था

अभी भी आवाज दोगे  तो एक नज़र देखेगा तुम्हे

पर रुकेगा नहीं , अब वो किसी के लिए नहीं रुकता

न रुकता  है न थकता  है ,

और हाँ ,

ख्वाब और ख्वाहिश अब यहाँ  नहीं रहते  

दोनो एक दिन जाते दिखे फिर लौट के नहीं आये

उनके घरों  में अब बहरूपिये  रहते  हैं  

तुम भी मिल आओ ।

आइना

short poems

आइना शक्लें  जुदा कर  गया

मेरी नस्लें  पता कर गया

निगाहें  ढूढती  रहीं  सरहदों  के निशाँ

बस यहीं  वो दगा कर गया  ।

बॅटवारा

Long poems

ना जाने इसकी ग़लती थी या उसकी ग़लती थी

बस रेल-गाड़ियाँ लाशों से भरी चलती थी

मौत मज़हब की बात करती थी

सहमी हुई दुआएँ अजूबों  को याद करती थी

जिन्दगी  अब एक लकीर  की  मोहताज़  थी

कल  रात जो चीख  सुनी वो कोई जानी – पहचानी ही आवाज थी

पीछे छूट गए घरों में अब खौफ रहता  था

घर भी उसके , गांव भी उसके , शहर भी उसके

भागते इन्सानों  को देख बस हसता रहता था

प्यार मुहब्बत पटरियों  पे पड़े  मिलते थे लहूलुहान

सरहद पे दौड़ती  रेलगाड़ियाँ थी शायद इस बात से अंजान

कहने को तो हजारों  लोग जो उन  रेलगाड़ियों  में  सवार  हुए

पर बड़ी  कोशिशों  के बाद भी, बस मातम ही थे जो  सरहद के  आर पार हुए ।